सहर





कुछ तो अंतर रहने दो,

कहीं मैं तुम एक ना हो जायें,
कुछ तो बातें रहने दो,
कहीं देर आज ना हो जाये,
क्या कह दूँ आज मनोरम कलरव;
और धूमिल गगन की बेला में,
पर ठहरो प्रिये! क्या जल्दी है,
कहीं अभी ठहर ना हो जाये,
इस नित्य नवल अहसास में,
मद्धम मद्धम उच्छ्वास में, 
देकर हाथों में हाथ; 
चल साथ दूर तक चलते हैं,
फिर कहीं सहर ना हो जाये।
image: here 
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